JAGDALPUR – 24 वर्षों में 3414 मुठभेड़ें, हजारों जानें गईं बस्तर की धरती और गणतंत्र की अलग कहानी
JAGDALPUR ।जब पूरा देश गणतंत्र दिवस पर संविधान, अधिकार और लोकतंत्र का उत्सव मनाता है, तब छत्तीसगढ़ की बस्तर धरती एक अलग ही गणतंत्र की कथा कहती है। यहां सुरक्षा बल केवल वर्दीधारी जवान नहीं, बल्कि लोकतंत्र के असली रक्षक बनकर उभरे हैं।
माओवाद के खिलाफ यह संघर्ष कोई हालिया लड़ाई नहीं, बल्कि चार दशकों से जारी एक लंबा युद्ध रहा है। छत्तीसगढ़ के गठन के बाद यह लड़ाई और भी अधिक तीव्र हो गई।
24 वर्षों में 3414 मुठभेड़ें, हजारों जानें गईं
वर्ष 2001 से 21 दिसंबर 2025 तक बस्तर संभाग में कुल 3414 मुठभेड़ें हुईं।
इन संघर्षों में
1573 माओवादी मारे गए
1318 सुरक्षा बलों के जवान बलिदान हुए
1821 निर्दोष नागरिक माओवादी हिंसा के शिकार बने
ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वह कीमत हैं, जो बस्तर ने चुकाई है।

शुरुआती दौर की कमजोरियां और खूनी अध्याय
शुरुआती वर्षों में सुरक्षा बल गुरिल्ला युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। माओवादियों ने इसी कमजोरी का फायदा उठाकर आईईडी और बारूदी सुरंगों को हथियार बनाया।
ताड़मेटला में 76, बुर्कापाल में 25 और रानीबोदली में 53 जवानों की शहादत बस्तर के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्याय रहे।
सलवा जुड़ूम और आदिवासी समाज की त्रासदी
2005 में सलवा जुड़ूम के दौर में हिंसा चरम पर पहुंच गई। आदिवासी समाज दो हिस्सों में बंट गया। माओवादियों ने जनअदालतों के नाम पर शिक्षक, सरपंच, महिलाएं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। यह दौर गणतंत्र के लिए सबसे कठिन परीक्षा साबित हुआ।
अमित शाह का संकल्प और बदली रणनीति
2021 में टेकुलगुड़ेम हमले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवाद के समूल खात्मे का लक्ष्य तय किया।
मार्च 2026 की समयसीमा के साथ पिछले चार वर्षों में बस्तर संभाग में 135 से अधिक नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। पहली बार सुरक्षा बल माओवादियों के कोर एरिया में स्थायी रूप से पहुंचे।
2025 बना निर्णायक वर्ष
वर्ष 2025 माओवाद विरोधी अभियान का निर्णायक अध्याय बनकर सामने आया।
3412 हथियार जब्त
4367 आईईडी निष्क्रिय
256 शीर्ष माओवादी ढेर
884 गिरफ्तार, 1562 ने आत्मसमर्पण किया
माओवादी महासचिव बसवा राजू समेत कई केंद्रीय समिति सदस्य मारे गए। माड़वी हिड़मा जैसे नाम इतिहास बन गए।
बंदूक हार रही है, लोकतंत्र जीत रहा है
आज उन गांवों में स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य और राशन पहुंच चुका है, जहां कभी डर का साया था। ग्रामीणों का भरोसा अब बंदूक से हटकर संविधान और सुरक्षा बलों पर टिक गया है।
बस्तर में अब बंदूक हार रही है और लोकतंत्र जीत रहा है।






